Wednesday, 3 October 2012

Interactive Bioscope: आधुनिकतम बाइस्कोप

शोध व प्रस्तुति: लखीचंद जैन
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देखो, देखो, देखो, देखो…
दिल्ली का कुतुब-मीनार देखो…
आगरे का ताजमहल…
बम्बई का बाजार देखो…
देखो, देखो, देखो…
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यदि आपने बचपन में बाइस्कोप पर कोई प्रस्तुति देखी हो तो… बाइस्कोप का जिक्र होते ही ऊपर की यह पंक्तियॉ जुबान पर आ जाती हैं | 1980 के दशक तक भारत में बाइस्कोप का बडे स्तर पर प्रचलन था | मनोरंजन हेतु प्रयोग में लाये जाने वाला यह यंत्र काफी वर्ष पहले भारत के गॉंव देहातों मे मेलों तथा साप्ताहिक बाजार के दिन चौक-चौराहें पर देखने मिलता था | बाईस्कोप में चित्र श्रृंखला के माध्यम से कथा दिखाई जाती थी | और इस यंत्र को चलाने वाला उस कथा को गाकर सुनाता था | चित्रों के जरिए विभिन्न विषयों तथा अपने आसपास के रंग-रंगीले जीवन के पहलुओं से बच्चों को अवगत कराया जाता था |
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उन दिनों, आज की  तरह के टेलिवीजन, सिनेमॅक्स जैसे आधुनिकतम मनोरंजन के दृक-श्रव्य माध्यम तथा यो-यो, बेब्लेड, गेमबॉय, प्ले-स्टेशन, आयपॉड, टॅबलेट जैसे खिलौने या संवाद के साधन नहीं थे | केवल बाइस्कोप एक मात्र यंत्र था जिससे बच्चों का मनोरंजन होता था | अनूठे ढंग का यह यंत्र अब दुर्लभ हो गया है |
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मोहनदास करमचन्द गाँधी ने भी अपने किशोरावस्था में बाइस्कोप पर मातृ-पितृभक्ति पर आधारित ‘श्रवणकुमार’ की प्रस्तुति देखी थी |
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'खोज गाँधीजी की' संग्रहालय में देश का सबसे बड़ा और आधुनिकतम बाइस्कोप देखने को मिलता है | इस बाइस्कोप मे लगे LCD परदों पर एक साथ आठ दर्शक गाँधीजी के बचपन पर आधारित प्रस्तुति को देख सकते हैं | इसे विकसित करते समय ‘बाइस्कोप’ की मूल विशेषताओं को कायम बनाये रखा है | उस पर उजले रंगों में पशु -पक्षी, तरह तरह के फुल - पत्तों की डिजाइन बनायी हुई है |

Monday, 24 September 2012

Museum Tour

 

जरुरतें और लालसा
म्युज़ियम में पहले हम इंटरैक्टीव टच स्क्रीन तथा वीडिओ फिल्म के जरिए अपनी जरुरतें, लालसा और उसके परिणामों के विषय में जानते हैं | इसके बाद मोहनदास करमचन्द गाँधी के बचपन के बारे मे जानने के लिए आगे बढते हैं |
बचपन
गाँधीजी का बचपन पोरबन्दर और राजकोट मे बीता | इस खण्ड में तत्कालीन परिवेश और वातावरण को आप पैनल्स के जरिए अनुभव कर सकते है | ‘बाईस्कोप’ से उनके बचपन के कुछ प्रसंगो  को फिल्मों के जरिए दिखाया गया हैं |
कहानियों की अनूठी प्रस्तुति
किशोरावस्था में गाँधीजी ने ‘राजा हरिश्चंद्र’ तथा ‘श्रवण-पितृभक्ति नाटक’ कहानियों को पढ़ा और देखा था | वे इन से बहुत प्रभावित हुए थे | इनको हम फ्लिप इंटरैक्टीव टेक्नालॉजी के जरिए देख सकते हैं और पढ़ भी सकते हैं | 
गलतियों को  स्वीकारना
बचपन में गाँधीजी  एक मित्र  की संगत के कारण कई बुरी आदतों के शिकार हो गए थे | जिसमें मांस खाना, पैसे चुराना, बीडी पीना प्रमुख हैं | जैसे ही उन्हें इन गलतियों का अहसास हुआ, उसे छोड़ दिया और फिर कभी नहीं दोहराया |
विलायत में पढाई
गाँधीजी ने विलायत में जाकर बैरिस्टर की पढ़ाई पूरी की | ‘‘मैं अपने सदाचार से सभ्य समझा जाऊँ तो ठीक है, नहीं तो यह लोभ मुझे छोड़ना चाहिए"  यह विचार उनके मन में आया | उन्होंने विलायती रहन-सहन छोड दिया | उनके विलायत के जीवन शैली को इंन्स्टालेशन के जरिए प्रस्तुत किया गया है |
पौधे से वृक्ष में परिवर्तन
बचपन की कहानियों, अन्य घटनाओं से सबक सीख कर गाँधीजी ने ‘सत्य और अहिंसा ’ को अपना लिया | यह छोटा पौधा धीरे-धीरे एक विशाल वृक्ष मे बदलते गया | इस अनूठे वृक्ष की छाया में बैठकर आप  दृक्-श्रव्य प्रस्तुति के माध्यम से इस का अनुभव कर सकते हैं |
रंगभेद के खिलाफ आन्दोलन
दक्षिण अफ्रीका में गाँधीजी को रंगभेद का अनुभव हुआ | उसको मैपिंग प्रोजेक्शन तथा एनिमेशन टेक्नालॉजी के जरिए दिखाया गया है | पीटर मेरित्सबर्ग मे ट्रेन से धक्का मार कर  उतारने की घटना का उन पर गहरा असर हुआ | जिससे प्रेरित होकर उन्होंने रंगभेद के खिलाफ आन्दोलन छेड दिया |
चम्पारन में सेवाकार्य
दक्षिण अफ्रीका से लौटने के बाद गाँधीजी समाज सेवा तथा स्वातंत्रता आन्दोलन में जुट गये | अहमदाबाद के साथ उन्होंने बिहार के चम्पारन की तिनकठिया प्रथा को जड़ से मिटा दिया | इस खण्ड में प्रदर्शित  डिस्प्ले पैनलों के जरिए स्वतंत्रता आन्दोलन में उनके प्रयासों तथा आश्रम के कार्यों का आप अनुभव कर सकते हैं |
जालियाँवाला  बाग हत्याकाण्ड
पहले गाँधीजी  का मानना था कि, अंग्रेजों की हुकूमत से ही हमारे देश का भला हो सकता है | लेकिन अमृतसर के जालियाँवाला बाग में हुई हिंसा के बाद उनकी सोच में बदलाव आया और उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ ‘असहयोग’ आन्दोलन छेड़ दिया |
स्वदेशी को बढावा
जालियाँवाला बाग में हुए नर संहार के बाद ‘असहयोग’ आन्दोलन धीरे-धीरे व्यापक होता गया | इसमें विदेशी कपड़ों की होली जलाई जाने लगी | जिससे भारतीयों में स्वदेशी को अपनाने की भावना जगी |
एकांत की राह
धीरे-धीरे सभी विचारधाराओं के लोग स्वतंत्रता आन्दोलन से जुडते चले गये | कुछ लोगों का मानना था कि, हिंसा से ही हमें आजादी मिल सकती है | इस सोच कारण अनेक क्षेत्रों हुई हिंसा से निराश होकर  उन्होंने आन्दोलन को रोक दिया और एकांत में चले गए | उनको पक्का विश्वास था कि, केवल अहिंसा का मार्ग ही देश को आजादी दिला सकता हैं |
करों का बोझ
अंग्रेजों द्वारा लगाये  गये  करों से आम आदमी बदहाल था | जिसके कारण उनके मन में अंग्रेजों के खिलाफ असंतोष बढता गया | इस खण्ड में प्रदर्शित की हुई शिल्पकृति में आम आदमी करों के बोझ से  दबता दिखाया गया है | इसी दौरान गाँधीजी ने दांडी मार्च भी  निकाला था |
सत्य ही ईश्वर है …
स्वतंत्रता आन्दोलन के दृश्य, गाँधीजी के जीवन से जुडी घटनाओं को श्वेत-श्याम तस्वीरों के जरिए प्रस्तुत किया है | काले चौकोर स्तंभ पर ‘सत्य’ से सम्बंधित उनकी पक्तियां उकेरी हुई है | कस्तुरबा गाँधीजी के देहांत पर गाँधीजी के मनःस्थिति की एक चित्र के माध्यम से सजीव किया गया है |
चरखा गैलरी
अंत में, एक चरखा गैलरी है | इसमें नऐ-पुराने  ढंग के कई चरखे रखे हुए है | समयानुसार चरखों का परिवर्तन यहाँ  देखने को मिलता है | साथ ही Hyper Realistic पध्दति से विकसित की हुई गाँधीजी की सजीव शिल्पकृति भी यहाँ है |
बच्चों से प्रेम
ऑडिटोरियम की बाहरी दीवार पर गांधीजी बच्चों से कितना प्रेम करते थे,  इसका अनूठा चित्र उकेरा हुआ है |
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